मैथिली कविता : चाउर होयबा धरि (हिंदी अनुवाद सहित)




जिनगीक मेह केर चौबगली
बिर्रो जकाँ नचैत कोनो विरोधी स्वर सऽ
अनवरत लतखुर्दनि भेलाक पछाति
द्वेश आ वैमनस्यक आगि पर चढल
चुप्पा प्रतिरोधक इनहोरमे उसनएलाक बाद
धधकैत समाजक आगू
हाकरोस करैत लोकक चएन पर
जखन कोनो जिम्मेदारीक ढेकी
अनचोकेमे दैत अछि कसगर चोट
तऽ संघर्षक करिछौन खोंइचाक भीतर स'
बहराइत अछि एकटा झलकैत व्यक्तित्व
नवकुट्टी चाउर जकाँ

सहज नै छैक
धान स' चाउर बनबाक यात्रा
सहए पड़ै छैक मारिते यातना
असह वेदना माझ ओझराएल जिनगीकें
नहि रहै छैक भरोस जे हेतैक भोर
क्षणभंगुर होमए लगै छैक उसांस
अबूह सन लगैत जिनगीमे
गुड्डी जकाँ पताए लगै छैक मोन
आ धान बनबाक लौलमे
बेसी काल खखरी बनि बैसैत अछि लोक
ओ लोक
जे निकसल अछि
धान स' चाउर बनबाक यात्रा पर

चाउर,
किन्नहुँ नै छैक पूर्णताक चेन्हासी
ओकरो दर-दुनियाँ सऽ फराक
कोनो बखारीमे
बरखो-बरख धरि
करए पड़ै छैक एकांतवास
एकटा कविए जकाँ
जीवन पर्यन्त करए पड़ै छैक तपस्या
साधए पड़ै छैक जिनगी
त्यागए पड़ै छैक फुसियाहा टिटिम्भा
नाँथए पड़ै छैक मोनक अकुलाहटि
तखन जा प्राप्त होइछ सिद्धि

एहिना
पऽथ नै भ' जाइछ पुरना चाउर
◼️



हिंदी कविता- चावल होने तक
◾◾◾◾◾◾◾◾

जीवन के स्तम्भ के चारों ओर
चक्रवात जैसे नाचते किसी विरोधी स्वर से
अनवरत लतमर्दन होने के बाद
द्वेष और वैमनस्य के आग पर चढ़कर
गुम्मा प्रतिरोध के खौलते हुए पानी में उबल जाने के बाद
धधकते समाज के आगे
हाहाकार करते लोंगो के सिर पर
जब किसी जिम्मेदारी की ढेकी
अकस्मात देता है कसकर चोट
तब संघर्ष के काले छिलके के अन्दर से
निकल उठता है एक झलकता हुआ व्यक्तित्व
नये कुटे हुए चावल जैसे

सहज नहीं है
धान से चावल बनने की यात्रा
सहना पड़ता है अनेकों यातनाएँ
असह्य दर्दों के बीच उलझे जीवन को
नहीं रहता है भरोसा जो होगी सुबह
क्षणभंगुर होने लगता है श्वास-प्रश्वास
पहाड़ जैसा लगता है जीवन
पतंग जैसे पताने लगता है मन
और धान बनने के उद्वेग में
अनेकों बार खखरी बन जाता है आदमी
जो निकला है
धान से चावल बनने की यात्रा पर

चावल
बिल्कुल नहीं है सम्पूर्णता का प्रतीक
उसे भी संसार से अलग
किसी बखारी में
सालों तक
करना पड़ता है एकांतवास
एक कवि के जैसे हीं
जीवन भर करना पड़ता है तपस्या
साधना पड़ता है जीवन
छोड़ना पड़ता है झूठे आडम्बरों को
नाथना पड़ता है मन की बेचैनी को
तब जाकर होती है प्राप्ति सिद्धि की

ऐसे हीं
पथ्य नहीं बन जाता है पुराना चावल ।
 ◼️
 
अनुवाद- नारायण झा
(पुरस्कृत, साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार)
 



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