मैथिली कविता : उत्सवधर्मी देश



 
गाम टपि
धुरखुर धरि आबि गेल अछि मृत्यु

लगैत अछि
ओलतीमे टाँगि देलक अछि पनिसल्ला
ठोपे-ठोप बून्न नहि
खसि रहल छैक लहास
दगधिक' कुश जकाँ हरनठ्ठ भेल अछि हियाओ

चिर-चिराइन गन्हसँ नकमानि भेल
गाम, नगर, देश सगर लेल
ई चोन्हर व्यवस्था
काटि नेने अछि मानिकथम्ह
सजा नेने अछि अछिया
लेसि नेने अछि ऊक
अदंकमे अछि लोक
कौड़ी अछैत
कोहामे नहि बेसाहल जा सकैए बसात
सांसक दिकदारी तोड़ि देने छैक सभक भरोस
जहिं-तहिं धुआँ रहलैक अछि जिनगी
धधकि रहल छैक हाकरोस
कन्नारोहटि अराधि नेने अछि गाम
वाक हरण भेल छैक शहर सभक
उत्सव रचि रहल अछि समसान

असलमे
मणिकर्णिकाक घाट बनल अछि
अपन ई उत्सवधर्मी देश
जतय पैरमे घुंघुरू बान्हि
नचैत अछि राजनीति
आ मरछाउर भेल अछि नचार लोक.
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