मैथिली कविता : बेरोजगारी (हिंदी अनुवाद सहित)
जरूरी नहि
जीबैत लहास बनबाक लेल
बेर-बेर गड़ैत नहसूर बेसाहए पकोहि
पिजुआएल घाहमे
ध' लएह कोनो असाध्य रोग
सांस चलबैत रहबाक लेल
कोनो ठेहा पर चढाओल जाए संक्रमित अंग
दर्दक पहाड़ त'र अहुछिया कटैत समयकें
अबूह सन लागए जिनगी
मृत्युक गोहारि करैत मोनमे
अंकुरियाए लागय अछिया चढ़बाक सेहन्ता
तकर खगता नहि
सांच त' ई छैक
जे एतबहि टा वितान गढ़बाक लेल
किंवा, जीबतेमे मरबाक लेल
पर्याप्त छैक, बेरोजगारी
◼️
कविता- बेरोजगारी
आवश्यक नहीं,
जिन्दा लाश बनने के लिए
बारम्बार गड़ते हुए नासूर
अरज ले मवाद ।
मवाद से भरे घाव मे
लग ही जाये कोई असाध्य रोग
श्वाँस चलाते रहने के लिए
किसी परिकठ पर चढ़ाया ही जाय संक्रमित अंग
दर्द के पर्वत के निचे बेचैन समय को
अशाक्य ही लगे जिन्दगी
मृत्यु की याचना करते मन में
अंकुरीत होने लगे, चिता पर चढ़ने की लालसा
वास्तव मे
नहीं है इस सब की आवश्यकता
सत्य तो ये है
बस इतना सा वितान गढ़ने के लिए
पर्याप्त है बेरोजगारी।
◼️
हिंदी अनुवाद- मैथिल प्रशान्त



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