आत्मकथ्य : आम छू अमरोड़ा छू


जेना कोनो चासमे छीटल मुठ्ठी भरि अन्न गृहस्थक बखारी भरबाक कुब्बा रखैत अछि, ठीक तहिना जँ हमरा लोकनि सेहो अपन नेना-भुटकाक हियमे मातृभाषाक बीया बाओग करी, तँ निस्संदेह मैथिलीक भविष्य हरियाएल रहत से भरोस अछि. तखन, बाल मोनक उद्वेगकें आखरमे समेटब कोनो चुनौती सँ कम नहि अछि वा ई कही जे बाल साहित्य लिखबाक लेल निठ्ठाह नेना बनब आवश्यक अछि, आ से नेनपनमे जीबाक हिस्सक स्कूलक लाथे एखनहुँ हमरा लगले अछि. संभवतः तें बाल साहित्य लिखब खूब अरघि रहल अछि.

         हमरा दृष्टिएँ बाल साहित्य लिखैत काल बालमोनक विज्ञानकेँ ध्यान राखब बेस आवश्यक छैक. एकटा बाल रचना उत्कृष्ट बाल साहित्य तखनहि मानल जएबाक चाही जखन ओहिमे सहजता, रोचकता आओर कल्पनाशीलताक गुण भेटैत हो. संगहि मनोरंजनक अनिवार्यताक संग बच्चा सभमे मानवीय संस्कारक संप्रेषण सेहो करए.
           हमरा जनैत बाल साहित्यकेँ भाषायी स्थापनक बऽह मानल जा सकैए. कारण, लोक अपन जीवनकालमे वएह भाषा सहजताक संग ग्राह्य करैत अछि, जे नेनपने सऽ पढ़ने रहैत अछि. एकर प्रत्यक्ष उदाहरण हमरा लोकनि छी, जे मातृभाषाक अपेक्षा हिंदी वा अंग्रेजी पढ़ैत काल बेसी "कंफर्ट" रहै छी. तकरा मूलमे अछि इसकुलिया बस्तामे मैथिलीक अनुपलब्धता.
           रहरहाँ देखल जाइत छैक जे धीया-पूता छोट काँतिक गेय कविता(राइम्स)केँ जल्दी आत्मसात करैत अछि. मुदा जखन मैथिली दिस ताकब, तऽ बाल साहित्यक ई विधा परती-पराँत सन दृष्टिगोचर होएत. कहबामे कनियो असोकर्य नहि जे अपन मातृभाषामे राइम्सक नितान्त अभाव बाल-बुतरूकेँ मैथिली सऽ दूर कऽ रहल अछि.
           अस्सलमे नेना-भुटकाकें मैथिली सऽ जोड़बाक एकटा प्रयासक नाओ छी "आम छू, अमरोड़ा छू". कहल जा सकैछ, जे ई यत्न मैथिली बाल साहित्यमे 'राइम्स'क रिक्तताके ध्यानमे राखि पहिल बेर चरिपतिया(बाल चरिपतिया)केँ संग्रहित कऽ पोथीक स्वरूपमे अनबाक छी. आब एहिमे हम कतेक सफल छी तकर मूल्यांकन तऽ अपने लोकनि करब. धरि, एतबा अवश्य कहब जे हमर ई पोथी, जऽ बाल-बुतरूक मोनमे मातृभाषाक गऽब लगा सकल तऽ हम स्वयंकें सफल बुझब.
            ...अंतमे निहोरा, जे हमर एहि यत्नकेँ मैथिलीक भविष्य धरि अवश्य पहुंचाबी.

अपनेक अमोल प्रतिक्रियाक आसमे...   


घर बैसल ई पोथी मंगेबाक लेल एहिठाम आउ
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