आत्मकथ्य : औनाइत आखर - Aunaait Aakhar



       असलमे कविता एकटा मनोवेग थिक, जे समाजिक पीड़ाकेँ चिंतासँ चिंतन धरिक यात्रा करबैत अछि. कविता एहन उर्जा थिक, जे समकालीन दृष्टिक संग सकारात्मक सोच विकसित करबामे सहायक अछि. निजगुतमे कविता मानवीय संवेदनाक पर्याय थिक. से कविता लिखलापर हमरा एक दिस आत्मिक संतुष्टि त' होइते अछि ओतहि दिस कविता हमरा मनुष्यताक लगीच अनैत अछि.
       हम जाहि आबोहवामे जीबैत छी हमर कविता सेहो ओतहि अँखुआइत अछि. हमरा लेल कविता अपना समाजक मनोदशाक अभिव्यक्ति थिक. मूलमे समाजक संघर्ष थिक. एहने यथार्थवादी दृष्टिकोण साझा करबाक दुस्साहसक नाओ थिक "औनाइत आखर"
       यद्यपि "औनाइत आखर" हमर पहिल कविता-संग्रह अछि. मुदा पछिला एक दशकसँ साहित्यमे सक्रिय रहैत हम जतबा कविताकेँ बूझलौ अछि, गमलौ अछि. तकरे बानगी थिक ई संग्रह. हमरा लगैए जे कविता नियारि-भासिक' नहि लिखल जा सकैए. कविता त' अन्तर्मनमे पहिनेसँ तैयार भ' औनाइत रहैत छैक आ उचित समय अएलापर स्फुटनक संग आखर बनि कागतपर छिरिया जाइत छैक. संभवतः तेँ कविताक लम्बाईकेर कोनो कसबट्टी नहि छैक. दीर्घसँ लघु धरि सभ काँतिक कविता सोझा अबैत रहल अछि. बशर्ते कविता भाव-तत्व, विचार, बिम्ब आ शिल्पक स्तरपर न्याय करैत हो.
       हम जखन लिखैत छी त' बलधकेल कविताकेँ नमारि पैघ करबामे विश्वास नहि रखैत छी. हमरा लगैए जे कविता कहबाक लेल बेसी आहे-माहे कहबाक बेगरता नहि छैक. ठाँहि-पठाँहि सेहो कविता कहल जा सकैए. आ हम सैह करैत एलौ अछि. हमर मानब अछि समयक मारामारीक कारणेँ दिनानुदिन साहित्यसँ कटि रहल पाठककेँ एहि तरहक लघु कविता(काँतिमे) पुनि साहित्यसँ जोड़ि सकबामे सक्षम अछि. से छोट धुआ-धजा अछैत हम अपन कवितामे ओ सभटा गुणधर्म रखबाक यत्न केलौ अछि जाहिसँ कविताकेँ पूर्णता प्राप्त भ' सकय. हमरा कहबामे कनियो असोकर्य नहि जे हमर ई संग्रह कविताक बोनसाई थिक. हं, एहिमे हम कतेक सफल भेलौ अछि आकि असफल से त' अपने पाठक आ समीक्षक लोकनि कहब. मुदा, हम एतबा धरि अवश्य कहि सकै छी जे एहि संग्रहमे हमरा भीतरक आखर पुरूष, अपन शत-प्रतिशत देबाक प्रयास केलक अछि. गवाह छी हम.
      आस अछि जे हमर बाल कविता-संग्रह जकाँ एहियो संग्रहकेँ अपने लोकनि हाथो-हाथ ल' अपन अथाह सिनेह देबैक.◼️
✍️ अक्षय आनन्द सन्नी   



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